जोहर से सती तक: मान-मर्यादा आधारित जीवन-मृत्यु परंपरा का विस्तार
श्रृंखला ब्लॉग 0/#1: जोहर – धर्मयुद्ध के प्रतिरोध का स्वरूप
भारत/GB
1303 से 1947 तक 644 वर्षों के सतत आक्रमण दबाव ने किस प्रकार एक क्षेत्रीय प्रथा को जन्म दिया जिसे सनातन धर्म ने कभी अनिवार्य नहीं किया
जोहर से सती तक: वह प्रश्न जिसका उत्तर टाला जाता है
जोहर से सती तक—यह रूपांतरण इतिहासकारों को लंबे समय से विचलित करता रहा है। सती जैसी विधवा-अग्नि-प्रवेश प्रथा राजस्थान में ही क्यों केंद्रित रही? स्वतंत्रता के बाद के 90% से अधिक प्रकरण उसी क्षेत्र में क्यों पाए गए? 1987 का रूप कंवर प्रकरण देवराला, राजस्थान में ही क्यों हुआ? यदि यह वास्तव में “सार्वभौमिक दमन” था, तो पूरे भारत में समान रूप से क्यों नहीं फैला?
उत्तर निहित है जोहर से सती तक की यात्रा को समझने में—इसे दो पृथक प्रथाओं के रूप में नहीं, बल्कि युद्धकालीन प्रतिरोध के शांतिकालीन सांस्कृतिक विस्तार के रूप में देखने में, उन क्षेत्रों में जहाँ 1303 से 1947 तक निरंतर आक्रमण का भय बना रहा।
जो आपकी दादी जानती थीं: जीवन का यथार्थ
उत्तर भारत—राजस्थान, हरियाणा और आस-पास के क्षेत्रों में बाल विवाह सामान्य था। बालिकाओं का विवाह शैशव अवस्था में ही कर दिया जाता, उन्हें परात में बैठाकर फेरे पूरे कराए जाते। परंतु सनातन धर्म ने कभी भी ऐसी बाल विधवाओं को अग्नि में प्रवेश का आदेश नहीं दिया।
कुंती, पांडु की पत्नी, सती नहीं हुईं—उन्होंने जीवन व्यतीत किया और पांडवों का मार्गदर्शन किया। गांधारी, उत्तरा—महाकाव्यों में अनेक विधवाएँ जीवन का चयन करती दिखती हैं। 464 ईस्वी में रानी राजवती ने सती का विचार किया, परंतु उसे त्यागकर दीर्घायु जीवन जिया।
तो जब शास्त्रों में सती अनिवार्य नहीं थी, तब राजस्थान में यह क्यों बनी रही? इसका उत्तर जोहर की विरासत में छिपा है।
Foundational Section (Hindi Adapted)
आधार: चित्तौड़ के तीन जोहर और मान-मर्यादा की स्थापना
1303 से 1568 के बीच चित्तौड़ दुर्ग ने तीन सामूहिक जोहर देखे—265 वर्षों में 37,000 महिलाओं ने बंदी बनाए जाने से पूर्व सामूहिक अग्नि-प्रवेश किया:
- 1303 – अलाउद्दीन खिलजी का घेराव: 16,000 महिलाएँ जोहर में सम्मिलित
- रानी पद्मिनी के नेतृत्व में
- पुरुषों द्वारा साका (अंतिम युद्ध प्रस्थान)
- 1535 – बहादुर शाह का घेराव: 13,000 महिलाएँ
- रानी कर्णावती के नेतृत्व में
- 1568 – अकबर का घेराव: 8,000 महिलाएँ
- 30,000 नागरिकों का वध और अनेक स्त्री-बालकों को बंदी बनाया गया
यह आवेश नहीं था। यह व्यवस्थित प्रतिरोध था। प्रत्येक पीढ़ी ने आत्मा की रक्षा को शरीर से ऊपर माना।
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