क्या योग केवल शारीरिक अभ्यास है, या उसके पीछे एक गहन दार्शनिक आधार भी है? यह लेख योगसूत्र १.२४ के आधार पर ईश्वर, चेतना, पुरुष, प्रकृति और मुक्ति की अवधारणा का तर्कपूर्ण विवेचन करता है तथा आधुनिक निरीश्वरवादी दृष्टिकोण और प्राचीन भारतीय दर्शन के बीच गंभीर बौद्धिक संवाद प्रस्तुत करता है।
