यह लेख दर्शाता है कि किस प्रकार इस्लामी अधिकार और आधुनिक संविधानों के बीच उत्पन्न संवैधानिक उलझन लोकतांत्रिक प्रणालियों को भीतर से पंगु बना रही है। धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर किए गए विधिक समायोजन न्याय, समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर करते हुए धीरे-धीरे संप्रभुता के क्षरण और सभ्यतागत आत्मघात की ओर ले जाते हैं।
